सवाल: खाकी पर राजनीति का रंग: कप्तान का आदेश, कारिंदे की मर्जी..!
टीम डेस्क 9575511705
शहडोल बुलेटिन l जिले में कानून-व्यवस्था को 'चुस्त-दुरुस्त' करने के बड़े-बड़े दावों के बीच, पुलिस अधीक्षक डॉ. संजय अग्रवाल का एक प्रशासनिक आदेश चर्चा का विषय बन गया है। मामला 15 पुलिस अधिकारियों के तबादले का है, जिसे 'प्रशासनिक दृष्टि से' और 'तत्काल प्रभाव से' लागू करने का फरमान जारी हुआ था। लेकिन, ऐसा लगता है कि कुछ 'कर्मठ' अधिकारियों के लिए कप्तान के आदेश से ज्यादा वजनदार नेताजी की सिफारिश है।
नियम-कायदे अपनी जगह, जुगाड़ अपनी जगह
व्यंग्य की बात यह है कि मध्य प्रदेश पुलिस विभाग के नियमों के अनुसार, किसी भी गैर-राजपत्रित अधिकारी (Non-Gazetted Officer) को सामान्यतः एक ही जिले में लगातार 3 से 4 वर्ष से अधिक समय तक नहीं रखा जाता है, जिसके बाद उनका जिला बदल दिया जाता है। बावजूद इसके, शहर की मलाईदार पोस्टिंग का मोह त्यागना इतना आसान नहीं होता। जब उप निरीक्षक उपेन्द्र त्रिपाठी का तबादला कोतवाली से हटाकर व्यौहारी किया गया, तो उन्होंने 'प्रशासनिक व्यवस्था' को ठेंगा दिखाना ही बेहतर समझा।
कप्तानी बनाम सिफारिश
सूत्रों की मानें तो, त्रिपाठी जी ने व्यौहारी जाने की बजाय, विधायक और सांसद के दरबार में हाजिरी लगाना ज्यादा जरूरी समझा। शहर में पैर जमाए रखने के लिए उन्होंने राजनीतिक आकाओं की देहरी नापनी शुरू कर दी। यह एक ऐसा 'पावर प्ले' है, जो महकमे के भीतर अनुशासन की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है।
जनता में भ्रम: असली बॉस कौन..?
इस पूरे घटनाक्रम ने जिले की भोली-भाली जनता को भ्रम में डाल दिया है:
कप्तान का कद: क्या एक आईपीएस अधिकारी, जो जिले का पुलिस प्रमुख है, उसके आदेश की कोई गरिमा नहीं है? क्या 'तत्काल प्रभाव' का मतलब सिर्फ कागजी कार्रवाई है..?
पहुंच वाले की हनक: क्या विभाग में काम करने का पैमाना पुलिसिंग है या फिर राजनेताओं के साथ 'अच्छे संबंध'..?
उपेन्द्र त्रिपाठी जैसे उदाहरण यह साबित करने के लिए काफी हैं कि महकमे में किसकी तूती बोलती है। जब एक छोटा अधिकारी कप्तान के आदेश को 'चैलेंज' कर दे, तो आम नागरिक यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि न्याय के लिए वह पुलिस कप्तान की चौखट पर जाए या फिर स्थानीय नेताओं के पास, जिनके इशारे पर विभाग नाचता नजर आ रहा है।
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