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जिस गांव से लोग जाते थे बाहर अब वहीं लौट रहे परिवार; लोककला से मिला रोजगार 100 परिवार वापस!

जिस गांव से लोग जाते थे बाहर अब वहीं लौट रहे परिवार; लोककला से मिला रोजगार 100 परिवार वापस!


टीम डेस्क:

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सीधी बुलेटिन!   बकबा गांव में लोककला अब सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि रोजगार का जरिया बनती जा रही है। गांव में लोककलाकारों की संख्या बढ़ने और कला को पेशे के रूप में अपनाने से लोगों को अपने ही गांव में कमाई का अवसर मिलने लगा है।

बकबा गांव में लगभग हर घर में लोककलाकार हैं। यहां के लोग पारंपरिक लोककला को अपनी आजीविका से जोड़ रहे हैं। कला के जरिए होने वाली कमाई से ग्रामीणों को गांव में ही रोजगार मिल रहा है और उन्हें काम की तलाश में दूसरे शहरों की ओर जाने की जरूरत कम पड़ रही है।

लोककला से रोजगार के अवसर मिलने का असर पलायन पर भी दिखाई दे रहा है। जानकारी के मुताबिक करीब 100 परिवार वापस अपने गांव लौट चुके हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो रोजगार की तलाश में दूसरे स्थानों पर चले गए थे।

अब गांव में ही काम और आमदनी का रास्ता बनने से कई परिवार वापस लौट रहे हैं।

पलायन घटकर 20 फीसदी!

बकबा गांव में पलायन पहले बड़ी समस्या था। रोजगार के सीमित अवसरों के कारण ग्रामीण परिवारों को बाहर जाकर मजदूरी या अन्य काम करना पड़ता था। लेकिन लोककला से जुड़कर रोजगार मिलने के बाद स्थिति में बदलाव आया है।

बताया गया है कि गांव में पलायन घटकर करीब 20 फीसदी रह गया है। यानी पहले की तुलना में अब काफी कम लोग रोजगार के लिए गांव से बाहर जा रहे हैं।

गांव में ही रोजगार से बदल रही तस्वीर!

स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने से परिवारों को अपने घर और गांव से जुड़े रहने का मौका मिल रहा है। इससे गांव की पारंपरिक कला भी जीवित रह रही है और नई पीढ़ी को भी अपनी लोक संस्कृति से जुड़कर इसे पेशे के रूप में अपनाने का अवसर मिल रहा है।

बकबा गांव की यह पहल बताती है कि स्थानीय कला और परंपरा को रोजगार से जोड़कर ग्रामीण पलायन को कम करने की दिशा में बदलाव लाया जा सकता है।

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